भारत मे जीवन बीमा का इतिहास: एक संक्षिप्त परिचय

भारत मे जीवन बीमा का इतिहास एक संक्षिप्त परिचय

बीमा की कहानी शायद उतनी ही पुरानी है जितनी मानव जाति की कहानी। वही वृत्ति जो आज आधुनिक व्यवसायियों को नुकसान और आपदा से खुद को सुरक्षित रखने के लिए प्रेरित करती है, आदिम पुरुषों में भी मौजूद थी। उन्होंने भी आग और बाढ़ और जनहानि के बुरे परिणामों को टालने की कोशिश की और सुरक्षा हासिल करने के लिए किसी तरह का बलिदान देने को तैयार थे। हालांकि बीमा की अवधारणा काफी हद तक हाल के दिनों का विकास है, विशेष रूप से औद्योगिक युग के बाद – पिछली कुछ शताब्दियों के बाद – फिर भी इसकी शुरुआत लगभग 6000 वर्षपहले हुई थी।

जीवन बीमा अपने आधुनिक रूप में वर्ष 1818 में इंग्लैंड से भारत आया था। कलकत्ता में यूरोपीय लोगों द्वारा शुरू की गई ओरिएंटल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी भारतीय धरती पर पहली जीवन बीमा कंपनी थी। उस अवधि के दौरान स्थापित सभी बीमा कंपनियों को यूरोपीय समुदाय की जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से लाया गया था और इन कंपनियों द्वारा भारतीय मूल निवासियों का बीमा नहीं किया जा रहा था। हालांकि, बाद में बाबू मुत्तीलाल सील जैसे प्रतिष्ठित लोगों के प्रयासों से विदेशी जीवन बीमा कंपनियों ने भारतीय जीवन का बीमा करना शुरू कर दिया। लेकिन भारतीय जीवन को घटिया जीवन माना जा रहा था और उन पर भारी अतिरिक्त प्रीमियम लगाया जा रहा था। बॉम्बे म्युचुअल लाइफ एश्योरेंस सोसाइटी ने वर्ष 1870 में पहली भारतीय जीवन बीमा कंपनी के जन्म की शुरुआत की, और सामान्य दरों पर भारतीय जीवन को कवर किया। अत्यधिक देशभक्ति के उद्देश्यों के साथ भारतीय उद्यम के रूप में शुरू होकर, बीमा कंपनियां समाज के विभिन्न क्षेत्रों में बीमा के माध्यम से बीमा और सामाजिक सुरक्षा के संदेश को ले जाने के लिए अस्तित्व में आईं। भारत इंश्योरेंस कंपनी (1896) भी राष्ट्रवाद से प्रेरित ऐसी ही कंपनियों में से एक थी। 1905-1907 के स्वदेशी आंदोलन ने अधिक बीमा कंपनियों को जन्म दिया। मद्रास में यूनाइटेड इंडिया, कलकत्ता में नेशनल इंडियन और नेशनल इंश्योरेंस और लाहौर में को-ऑपरेटिव एश्योरेंस की स्थापना 1906 में हुई थी। महान कवि रवींद्रनाथ टैगोर, कलकत्ता में। इंडियन मर्केंटाइल, जनरल एश्योरेंस और स्वदेशी लाइफ (बाद में बॉम्बे लाइफ) इसी अवधि के दौरान स्थापित कुछ कंपनियां थीं। 1912 से पहले भारत में बीमा व्यवसाय को विनियमित करने के लिए कोई कानून नहीं था। वर्ष 1912 में जीवन बीमा कंपनी अधिनियम और भविष्य निधि अधिनियम पारित किए गए। जीवन बीमा कंपनी अधिनियम, 1912 ने यह आवश्यक बना दिया कि कंपनियों की प्रीमियम दर सारणी और आवधिक मूल्यांकन ख मांकक द्वारा प्रमाणित किए जाने चाहिए। लेकिन अधिनियम ने कई मामलों में विदेशी और भारतीय कंपनियों के ख च भेदभाव किया, जिससे भारतीय कंपनियों को नुकसान हुआ।

द इंश्‍योरेंस एक्ट 1938 भारत का पहला ऐसा कायदा था, जिसने जीवन बीमा के साथ- साथ सभी बीमा कम्पनियों के उद्योग पर राज्य सरकार का कड़ा नियंत्रण लागू किया.काफी समय से जीवन बीमा उद्योग को राष्ट्रीय करण प्रदान करने की मांग चल रही थी, लेकिन इसने गति 1944 में पकड़ी जब 1938 में लेजिस्‍लेटिव असेम्बली के सामने लाइफ इंश्‍योरेंस एक्ट बिल को संशोधित करने का प्रस्ताव रखा गया. इसके बावजूद भारत में काफी समय के बाद जीवन बीमा कम्पनियों का राष्ट्रीय करण 18 जनवरी 1956 में हुआ. राष्ट्रीय करण के समय भारत में करीब 154 जीवन बीमा कम्पनियां, 16 विदेशी कम्पनियां और 75 प्रोविडेंड कम्पनियां कार्यरत थीं.

इन कम्पनियों का दो स्थितियों में राष्ट्रीय करण हुआ प्राथमिक अवस्था में इन कम्पनियों के प्रशासनिक आधिकार ले लिए गए, तत्पश्चात एक कॉम्प्रेहेन्सिव बिल के तहत इन कम्पनियों का स्वामित्व भी सरकार ने अपने कब्ज़े में ले लिया. भारतीय संविधान ने 19 जून 1956 को लाइफ इंश्‍योरेंस कार्पोरेशन एक्ट पास किया. 1 सितंबर 1956 में लाइफ इंश्‍योरेंस कार्पोरेशन ऑफ इण्डिया की स्थापना हुई, जिसका उद्देश था, जीवन बीमा को बड़े पैमाने पर फैलाना, खास तौर पर गाँव में, ताकि भारत के हर नागरिक को पर्याप्‍त आर्थिक सहायता उचित दरों पर उपलब्‍ध करवाई जा सके.जीवन बीमा निगमी के 5 ज़ोनल अधिकारी थे, 33 डिवीज़नल ऑफिसर और 212 शाखा अधिकारी थे, इसके अलावा कार्पोरेट ऑफिस भी बना. जीवन बीमा के कॉन्ट्रैक्ट लंख अवधि के होते हैं और इस पॉलिसी के तहत हर तरह की सेवाएं दी जाती रही हैं, बाद के वर्षों में इस बात की ज़रूरत महसूस हुई कि इसकी कार्यप्रणाली का विस्तार किया जाये और हर ज़िला हेडक्वार्टर में शाखा ऑफिस भी बनाए जाएं.जीवन बीमा निगमी का पूरा घटन शुरू हुआ और बड़े पैमाने पर नए- नए शाखा ऑफिस खोले गये. पुर्नघटन के परिणाम स्वरूप तमाम सेवाएं इन शाखाओं में स्थानांतरित हो गईं और सभी शाखाएं लेखा- जोखा विभाग बन गईं, जिससे कार्पोरेशन की कार्यप्रणाली और प्रदर्शन में कई -कई गुना सुधार हुआ। ऐसा देखा गया कि 1957 में लालबाग में 200 करोड़ रूपये के बिज़नेस से कार्पोरेशन ने 1969- 70 तक अपना बिज़नेस 1000 करोड़ रूपये तक पहुंचा दिया और अगले सिर्फ दस वर्षों में ही जीवन बीमा निगम ने अपना बिज़नेस 2000 करोड़ रूपये तक पहुंचा दिया. जब 80 के दशक की शुरूआत में फिर से पुर्नघटन हुआ, तो नई पॉलिसियों की वजह से 1985 – 86 तक व्यापार 7000 करोड़ रूपये से ऊपर जा पहुंचा.

आज जीवन बीमा निगम 2048 पूरी तरह से कम्प्यूटरीकृत शाखा कार्यालयों, 113 मंडल कार्यालयों, 8 क्षेत्रीय कार्यालयों, 1381 सैटेलाइट कार्यालयों और कॉर्पोरेट कार्यालय के साथ कार्य करता है। जीवन बीमा निगमी का वाइड एरिया नेटवर्क 113 मंडल कार्यालयों को कवर करता है और मेट्रो एरिया नेटवर्क के माध्यम से सभी शाखाओं को जोड़ता है। एलआईसी ने चुनिंदा शहरों में ऑनलाइन प्रीमियम संग्रह सुविधा प्रदान करने के लिए कुछ बैंकों और सेवा प्रदाताओं के साथ समझौता किया है। एलआईसी की ईसीएस और एटीएम प्रीमियम भुगतान सुविधा ग्राहकों की सुविधा के अतिरिक्त है। ऑनलाइन कियोस्क और आईवीआरएस के अलावा, मुंबई, अहमदाबाद, बैंगलोर, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता, नई दिल्ली, पुणे और कई अन्य शहरों में सूचना केंद्र शुरू किए गए हैं। अपने पॉलिसीधारकों को आसान पहुंच प्रदान करने की दृष्टि से, एलआईसी ने अपने अनुषंगी संपर्क कार्यालयों की शुरुआत की है। अनुषंगी कार्यालय छोटे, छोटे और ग्राहक के निकट हैं। उपग्रह कार्यालयों के डिजिटलीकृत रिकॉर्ड भविष्य में कहीं भी सर्विसिंग और कई अन्य सुविधाएं प्रदान करेंगे।

जीवन बीमा निगम ने वर्तमान में एक करोड़ पॉलिसियां जारी की हैं. 15 अक्‍टू. 2005 में इसने 1,09,32,955 नई पॉलिसियां जारी करके एक नया कीर्तिमान बनाया है. पिछले वर्षके मुकाबले 16.67 % की विकास दर हासिल की है. तब से लेकर अब तक जीवन बीमा निगम ने बहुत सारे कीर्तिमान बनाए हैं और जीवन बीमा व्यापार के अलग- अलग क्षेत्र में अनेक बार प्रदर्शन से नए- नए कीर्तिमान बनाए हैं.

जिस आशा और अपेक्षा से हमारे पूर्वजों ने इस देश में जीवन बीमा का घटन किया था, उसी उद्देश्‍य को लेकर आज भी जीवन बीमा निगम देश के अधिक से अधिक घरों में सुरक्षा की ज्योति को प्रज्‍जवलित रखना चाहती थी, इन्सान अपने और अपने परिवार की देखभाल करने में सक्षम हो सके.

»जीवन बीमा निगम व्यापार क्षेत्र के कुछ किर्तीमान :-

1818: भारत की धरती पर पहली जीवन बीमा कंपनी ओरिएंटल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी ने काम करना शुरू किया।

1870: बॉम्बे म्युचुअल लाइफ एश्योरेंस सोसाइटी, पहली भारतीय जीवन बीमा कंपनी ने अपना व्यवसाय शुरू किया।

1912: इण्डियन लाईफ बीमा कम्पनीज ऍक्ट , जीवन बीमा व्यापार को व्यस्थित किने वाला पहला कानून बना।

1928: भारतीय बीमा कंपनी अधिनियम अधिनियमित किया गया ताकि सरकार जीवन और गैर-जीवन बीमा दोनों व्यवसायों के बारे में सांख्यिकीय जानकारी एकत्र कर सके।

1938: बीमा अधिनियम द्वारा पहले के कानून को समेकित और संशोधित किया गया ताकि जनता के हितों की रक्षा की जा सके।

1956: 245 भारतीय और विदेशी बीमा कंपनियों और प्रोविडेंट सोसायटियों को केंद्र सरकार ने अपने अधीन कर लिया और उनका राष्ट्रीयकरण कर दिया। एलआईसी संसद के एक अधिनियम, एलआईसी अधिनियम 1956 द्वारा भारत सरकार से 5 करोड़ रुपये के पूंजी योगदान के साथ गठित किया गया।

दूसरी ओर, भारत में सामान्य बीमा व्यवसाय, ब्रिटिश द्वारा कलकत्ता में वर्ष 1850 में स्थापित पहली सामान्य बीमा कंपनी ट्राइटन इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड में अपनी जड़ें जमा सकता है।

»भारतीय सामान्य बीमा व्यवसाय के कुछ महत्वपूर्ण किर्तीमान :-

1907: इंडियन मर्केंटाइल इंश्योरेंस लिमिटेड की स्थापना, सामान्य बीमा व्यवसाय के सभी वर्गों को संचालित करने वाली पहली कंपनी थी ।

1957: भारतीय बीमा संघ की एक शाखा, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल उचित आचरण और ठोस व्यापार प्रथाओं को सुनिश्चित करने के लिए एक आचार संहिता तैयार करती है।

1968: निवेश को विनियमित करने के लिए बीमा अधिनियम में संशोधन किया गया और न्यूनतम शोधन क्षमता मार्जिन और टैरिफ सलाहकार समिति की स्थापना की गई।

1972: सामान्य बीमा व्यवसाय (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 ने 1 जनवरी 1973 से भारत में सामान्य बीमा व्यवसाय का राष्ट्रीयकरण किया।

 

107 ख माकर्ताओं का समामेलन किया गया और उन्हें चार कंपनियों में बांटा गया। नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड जीआईसी को एक कंपनी के रूप में शामिल किया गया।

एलआईसी के उद्देश्य

जीवन बीमा को व्यापक प्रसार देना और ख़ास तौर से ग्रामीण इलाकों और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों तक उसे पहुंचाना, ताकि देश के तमाम बीमा करने योग्य लोगों तक पहुंचा जा सके और वाजिब लागत पर उन्हें मृत्यु से होने वाले वित्तीय नुकसान के प्रति सुरक्षा प्रदान की जा सके.

»बीमा संलग्न बचत को आकर्षक बना कर जनता को बचत के लिए प्रेरित करना.

»अपने पॉलिसी धारकों के प्रति अपने पहले दायित्व, कोष के निवेश को ध्यान में रखना, जिनके धन को वह धरोहर के रूप में अपने पास रखता है और इस निवेश प्रक्रिया में समूचे समाज के हित से अपनी नजर न हटने देना; पॉलिसी धारकों और समूचे समाज के हित को ध्यान में रखते हुए राष्ट्र की प्राथमिकताओं और आकर्षक लाभ देने की ज़िम्मेदारी के मद्देनजर कोष का निवेश कराना.

»ज़्यादा से ज़्यादा किफ़ायत से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए व्यापार करना कि धन पॉलिसी धारकों का है.

»बीमित व्यक्तियों और समूहों के हितों के संरक्षक के रूप में काम करना.

»बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश के मद्देनजर पैदा होने वाली जीवन बीमा आवश्यकताओं को पूरा करना.

»सौजन्यतापूर्वक कारगर सेवा प्रदान करके बीमित व्यक्तियों का ज़्यादा से ज़्यादा हित साधने के लिए निगम में काम करने वाले तमाम लोगों की कार्यक्षमता का अधिकतम इस्तेमाल करना.

»निगम के तमाम अभिकर्ताओं और कर्मचारियों के मन में भागीदारी गर्व और संतुष्टि का भाव भरना, ताकि वह समर्पित भाव से अपने दायित्वों का पालन करें और निगम के लक्ष्य को पूरा करने के लिए समर्पित रहें |

लक्ष्य

 

“प्रतियोगी लाभ देने वाले उत्पादों और वित्तीय सेवाएं मुहैया कराकर आर्थिक सुरक्षा के माध्यम तथा प्रतियोगी लाभ देने वाले उत्पादों से लोगों से लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना और प्रदर्शन करने वाले आर्थिक विकास के लिये उपाय का प्रबंध करना.”

 

 

दृष्टि

“समाजों और भारत के गौरव के महत्व का एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी वित्तीय समूह का निर्माण करना ।”

भारत में जीवन बीमा की शुरुआत 100 वर्ष पहले हुई थी।
हमारे देश में, जो दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाले देशों में से एक है, बीमा की प्रमुखता को उतना व्यापक रूप से नहीं समझा जाता है, जितना समझा जाना चाहिए। एलआईसी के विशेष संदर्भ के साथ पाठकों को जीवन बीमा की कुछ अवधारणाओं से परिचित कराने का एक प्रयास है।
बहरहाल, यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यहां हम जो कुछ भी बताने जा रहे हैं, वह एलआईसी की किसी पॉलिसी के नियम/ शर्तों या उसके लाभों या विशेषाधिकारों का विस्तृत ब्यौरा नहीं है.
हालांकि, यह स्पष्ट रूप से समझा जाना चाहिए कि निम्नलिखित सामग्री किसी भी तरह से एलआईसी पॉलिसी या इसके लाभों या विशेषाधिकारों के नियमों और शर्तों का विस्तृत विवरण नहीं है।
बहरहाल, यह बात ध्यान रखने योग्य है कि यहां हम जो कुछ भी बताने जा रहे हैं, वह एलआईसी की किसी पॉलिसी के नियम/ शर्तों या उसके लाभों या विशेषाधिकारों का विस्तृत ब्यौरा नहीं है. विस्तृत जानकारी के लिए हमारे शाखा या मंडल कार्यालय से संपर्क करें. कोई भी एलआईसी अभिकर्ताआपकी आवश्यवता के अनुरूप पॉलिसी का चुनाव करने और उसके भुगतान में आपकी मदद करके खुश होगा.

जीवन बीमा क्या है?

जीवन बीमा ऐसा अनुबंध है, जो उन घटनाओं के घटने पर, जिनके लिए बीमित व्यक्ति का बीमा किया जाता है, एक ख़ास रकम अदा करने का वादा करता है.

अनुबंध निम्नलिखित अवधि के दौरान बीमित रकम के भुगतान के लिए वैध होता है :

  • ●भुगतान तिथि, या
  • ●या नियत अवधि के अंतराल पर .खास-.खास तिथियों पर या?
  • ●दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु पर बशर्ते कि वह भुगतान अवधि से पहले हो

अनुबंध के तहत पॉलिसी धारक को नियत अंतराल पर निगम को प्रीमियमों का भुगतान करना होता है. एल.आई.सी.सार्वभौमिक रूप एक से ऐसा संस्थान माना जाता है, जो जोखिम दूर करता है और अनिश्चितता की जगह निश्चितता लाता है तथा आजीविका कमाने वाले के असामयिक निधन पर परिवार की समय से मदद करता है.

कुल मिला कर जीवन बीमा मृत्यु की वजह से पैदा होने वाली समस्याओं का सभ्यताजन्य आंशिक समाधान है. संक्षेप में, जीवन बीमा का संबंध हर व्यक्ति के जीवन में आने वाली दो समस्याओं से हैः

  1. ●समय से पहले व्यक्ति के मर जाने और अपने आश्रितों को उनके हाल पर छोड़ जाने
  2. ●बुढ़ापे तक बिना सहारे के जीने की
जीवन बीमा बनाम अन्य बचतें

बीमा अनुबंध:
बीमा अनुबंध चरम सद्भावनापूर्ण अनुबंध होता है, जिसे तकनीकी तौर पर “चरम विश्वास” कहा जाता है। तमाम महत्वपूर्ण तथ्यों का खुलासा करने का सिद्धांत इसी महत्वपूर्ण सिद्धांत पर आधारित है, जो हर तरह के ख मे पर लागू होता है.

पालिसी लेने के समय पालिसी धारक को सुनिश्चित कराना चाहिए कि प्रस्ताव प्रपत्र में पूछे गये तमाम सवालों के सही जवाब दिये जायें ब कोई भी .गलतबयानी , किसी भी ची.ज का खुलासा न करना या किसी दस्तावे.ज में धोखाधड़ी करके जोखिम य स्वीकार ‘ कराना बीमा अनुबंध को अमान्य और निरस्त कर देता है।

सुरक्षा:
जीवन बीमा की मा.र्फत की जाने वाली बचत बचतकर्ता की मृत्यु हो जाने पर जो.खिम के र्खिंला.फ सुरक्षा की पूरी गारंटी देता है ब यही नहीं , निधन की स्थिति में जीवन बीमा पूरी बीमित राशि का भुगतान ( मय अधिलाभ ों के जहां अधिलाभमिलते हैं ) आश्र्वस्त कराता है ब जबकि दूसरी बचतों में सि.र्फ बचत की राशि मय ब्याज के अदा की जाती है

समृद्धि बढ़ाने में मदद:
जीवन बीमा समृद्धि को प्रोत्साहन देता है ब यह दीर्घकालिक बचत का अवसर प्रदान करता है क्योंकि प्लान में निहित आसान किस्तों में आसानी से भुगतान किया जा सकता है ब (मसलन्‌ प्रीमियमों का भुगतान या तो माहवार, तिमाही, छमाही या सालाना किस्तों में किया जाता है)
उदाहरणार्थ यवेतन बचत योजना’ (जिसे आम तौर पर यएसएसएस’ के नाम से जाना जाता है) के तहत बीमित व्यक्ति के वेतन से माहवार कटौती की मा.र्फत प्रीमियम के भुगतान का आसान उपाय मुहैया करती है
इस तरह के मामलों में नियोक्ता काटी गयी प्रीमियमें सीधे एलआईसी को अदा कर देता है ब वेतन बीमा प्लान किसी भी संस्थान या प्रतिष्ठान के लिए आदर्श प्लान होती है , अलबत्ता इसके साथ कुछ नियम/ शर्तें जु ड़ी होती हैं

नकदी:
बीमा बचत के मामले में किसी ऐसी पालिसी की जमानत पर जो .क.र्ज मूल्य प्राप्त कर चुकी हो , .क.र्ज मिलना आसान होता है . इसके अलावा , जीवन बीमा पालिसी को व्यावसायिक .क.र्ज की जमानत के रूप में भी स्वीकार किया जाता है

ढकर राहत:
आय कर और संपत्ति कर कटौती के उपयोग का भी जीवन बीमा सबसे उपयुक्त उपाय है ब जीवन बीमा की प्रीमियमों के रूप में अदा की जाने वाली राशि पर यह सुविधा उपलब्ध है , जो लागू आय कर दरों पर निर्भर करती है

करदाता कर .कानून के प्रावधानों का लाभ उठाकर करों में रिआयत पा सकता है . इस तरह के मामलों में बीमित व्यक्ति को दूसरी तरह की प्लान के मु.काबले छोटी प्रीमियमें भरती होती हैं

जरूरत के समय पैसे:
उपयुक्त बीमा प्लान वाली पालिसी लेकर या कई अलग – अलग योजनाओं के समुय वाली पालिसी लेकर समय – समय पर पैदा होने वाली पैसों की .जरूरत को पूरा किया जा सकता है
बच्चों की पढ़ाई – लिखाई, गृहस्थी शुरू करने या शादी के. खर्चों या किसी. खास व.क्.फे में पैदा होने वाली मौद्रिक .जरूरतों को पूरा करना इन पालिसियों की मदद से आसान हो जाता है इसके विपरीत पालिसी के पैसे व्यक्ति के सेवानिवृत्ति होने पर मकान बनवाने या दूसरे निवेशों जैसे कामों के लिए उपलब्ध हो सकते हैं इसके अलावा , पालिसी धारकों को मकान बनवाने या .फ्लैट .खरीदने के लिए .क.र्ज भी उपलब्ध कराया जाता है ( हालांकि इसके साथ कुछ शर्तें लागू होती हैं )

 

कौन खरीद सकता है पालिसी:

 

कोई भी वयस्क स्त्री – पुरुष जो वैध अनुबंध कर सकता है अपना और उनका बीमा करा सकता है जिनके साथ उनके बीमा कराने योग्य हित जुड़े हों
व्यक्ति अपने पति / या पत्नी या बों का भी बीमा करा सकता है लेकिन इसके साथ कुछ शर्तें जु ड़ी होती हैं ब बीमा प्रस्तावों को स्वीकार करते समय निगम व्यक्ति के स्वास्थ्य , उसकी आय और दूसरे प्रासंगिक कारकों पर विचार करता है

 

स्त्रियों के लिए ख मा :

 

राष्ट्रीयकरण ( 1955 ) से पहले कितनी ही बीमा कंपनियां स्त्रियों का बीमा करने के लिए अतिरिक्त प्रीमियमें लेती थीं या कुछ अवरोधक शर्तें लगाती थीं. बहरहाल, राष्ट्रीयकरण करने के बाद से जिन शर्तों पर औरतों का जीवन बीमा किया जाता है, उन शर्तों की समय-समय पर समीक्षा की जाती रही है आज की तारी.ख में कमाने वाली कामकाजी औरतों को मर्दों के समतुल्य माना जाता है . दूसरे मामलों में निवारक शर्त लगायी जाती है . वह भी सि.र्फ तब जब औरत की उम्र ३० वर्षतक हो और कराधान सीमा में आने लायक उसकी आमदनी न हो.

 

चिकित्सकीय गैर चिकित्सकीय प्लान:

 

आम तौर पर जीवन बीमा बीमित व्यक्ति के स्वास्थ्य की जांच के बाद किया जाता है . बहरहाल , जीवन बीमा को व्यापक प्रसार देने और असुविधाओं को टालने के लिए जीवन बीमा निगम बिना डाक्टरी जांच के बीमा सुरक्षा देने लगा है , जिसके साथ कुछ शर्तें जु ड़ी होती हैं.

 

लाभपूर्ण और बिना लाभ की प्लान:

 

कोई बीमा पालिसी लाभ आधारित हो सकती है या बिना लाभ की भी हो सकती है ब लाभ आधारित पालिसियों के मामले में घोषित अधिलाभकी, अगर इस तरह के अधिलाभकी घोषणा की गयी हो , एक निश्चित अवधि पर होने वाले नियमित मूल्यांकनों के बाद पालिसी के साथ आवंटन किया जाता है और अनुबंधित राशि के साथ उनका भुगतान देय होता है.

बिना लाभ वाली पालिसियों के मामले में बिना किसी जो ड़ के अनुबंधित राशि अदा की जाती है ब लाभ युक्त पालिसी की प्रीमियमों की राशि इसीलिए लाभ रहित पालिसियों के मु.काबले .ज्यादा होती है.

 

कीमैन ख मा:

 

कीमैन बीमा व्यापारिक कंपनियां / कंपनी को अपने महत्वपूर्ण कर्मचारियों के असामयिक निधन से होने वाले वित्रीय नुकसान से बचाने के लिए करती हैं.

 

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